असम में लोकतंत्र पर सवाल: हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन के कार्यक्रमों पर रोक, जनता से फोन पर किया संबोधन

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असम की वीर और क्रांतिकारी धरती पर एक बार फिर लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने की कोशिशों के आरोप सामने आए हैं। राजनीतिक घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति को गरमा दिया है और कई सवाल खड़े कर दिए हैं।


बताया जा रहा है कि बीते दिन झारखंड की विधायक और प्रमुख नेता कल्पना सोरेन को सभा करने से रोका गया। इसके ठीक अगले दिन झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को भी असम के रोंगोनदी और चाबुआ विधानसभा क्षेत्रों में आयोजित कार्यक्रमों में जाने की अनुमति नहीं दी गई। उन्हें अपने समर्थकों और स्थानीय जनता से सीधे मिलने से भी रोक दिया गया।


हालांकि, इन प्रतिबंधों के बावजूद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने हार नहीं मानी और फोन के माध्यम से सभा में उपस्थित लोगों को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विपक्षी दलों को यह लगता है कि संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर वे लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि वर्षों से चाय बागानों में रहने वाले लाखों आदिवासी भाई-बहनों को दबाने और रोकने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन उनकी आवाज़ कभी पूरी तरह दबाई नहीं जा सकी। उन्होंने विश्वास जताया कि इतिहास गवाह है—जब-जब आवाज़ दबाई जाती है, वह और अधिक बुलंद होकर सामने आती है।


अपने संदेश में उन्होंने आगामी 9 अप्रैल का भी जिक्र करते हुए कहा कि इस दिन जनता अपने अधिकारों और संघर्ष का जवाब देगी। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे “तीर-धनुष” चुनाव चिन्ह पर बटन दबाकर अपने अधिकारों और सम्मान की लड़ाई को मजबूत करें।


इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी दलों को समान रूप से प्रचार और अभिव्यक्ति का अधिकार मिल रहा है या नहीं।

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