JTET भाषा विवाद: उच्चस्तरीय समिति ने मुख्यमंत्री को सौंपी रिपोर्ट, भोजपुरी-मगही को क्षेत्रीय भाषा सूची में शामिल करने पर मतभेद

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रांची, झारखंड: झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा के रूप में शामिल करने को लेकर जारी विवाद अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पाले में पहुंच गया है। इस मुद्दे पर गठित उच्चस्तरीय समिति ने अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है। हालांकि, समिति इस मामले में सर्वसम्मति नहीं बना सकी और अंतिम फैसला अब मुख्यमंत्री को लेना है।


दरअसल, इस विवाद को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर मई महीने में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था। समिति की पहली बैठक में संबंधित दस्तावेज और आवश्यक आंकड़े उपलब्ध नहीं होने के कारण कोई निर्णय नहीं हो सका। इसके बाद विवाद बढ़ने पर अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समाज से एक-एक मंत्री को भी समिति में शामिल किया गया, जिससे समिति सात सदस्यीय हो गई।


समिति की कुल तीन बैठकें हुईं। दूसरी और तीसरी बैठक में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा सूची में शामिल करने के मुद्दे पर मंत्रियों के बीच तीखी बहस हुई। अंततः समिति दो हिस्सों में बंट गई और कोई सर्वसम्मति नहीं बन सकी।


समिति में शामिल वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर, कृषि मंत्री दीपिका पांडेय सिंह और मंत्री संजय प्रसाद ने इन भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा सूची में शामिल करने का समर्थन किया। समर्थक मंत्रियों का कहना है कि किसी भी क्षेत्र के अभ्यर्थियों के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए और सभी को समान अवसर मिलना चाहिए। उनका तर्क है कि पलामू, गढ़वा, लातेहार, देवघर, गोड्डा सहित कई जिलों में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका बोलने वालों की बड़ी आबादी रहती है।

ऐसे में इन भाषाओं को बाहर रखना व्यावहारिक नहीं होगा। साथ ही उनका कहना है कि जब बंगला और ओड़िया जैसी बाहरी भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा मिल सकता है, तो इन भाषाओं को शामिल करने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।


वहीं दूसरी ओर मंत्री सुदिव्य कुमार, योगेंद्र प्रसाद, हफीजुल हसन और शिल्पी नेहा तिर्की ने इन भाषाओं को शामिल करने का विरोध किया। विरोध करने वाले मंत्रियों का कहना है कि भोजपुरी, मगही और अंगिका झारखंड की मूल क्षेत्रीय भाषाएं नहीं हैं, इसलिए इन्हें क्षेत्रीय भाषा सूची में शामिल करना उचित नहीं होगा। उनका यह भी तर्क है कि जब संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और अन्य केंद्रीय परीक्षाओं में इन भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, तो झारखंड में भी इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि झारखंड की अपनी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की अलग पहचान है और राज्य की भाषा नीति में उन्हीं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

बताया जा रहा है कि पहले पांच सदस्यीय समिति में तीन मंत्री इन भाषाओं के पक्ष में थे और दो विरोध में। बाद में दो नए मंत्रियों को शामिल किए जाने के बाद समीकरण बदल गया और विरोध करने वाले मंत्रियों की संख्या चार हो गई, जबकि समर्थन में केवल तीन मंत्री रह गए। ऐसे में समिति किसी साझा निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी।


अब पूरी रिपोर्ट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सौंप दी गई है। राज्य सरकार इस रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद अंतिम निर्णय लेगी कि JTET की क्षेत्रीय भाषा सूची में भोजपुरी, मगही, मैथिली और अंगिका को शामिल किया जाएगा या नहीं।


इस फैसले का असर हजारों JTET अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है। इसलिए अब सभी की नजर मुख्यमंत्री के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई है।

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