जीत महतो मौत मामला: 2 लाख देकर पुलिस द्वारा मामला दबाने का आरोप, अर्जुन मुंडा और अरुण महतो ने पुलिस पर लगाए गंभीर आरोप ।

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जमशेदपुर के मानगो स्थित गोकुल नगर निवासी एमजीएम थाना क्षेत्र के जीत महतो की मौत का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। जहां एक ओर परिजनों के थाना पहुंचने और कथित रूप से दो लाख रुपये मिलने के बाद घर लौटने की खबर सामने आई, वहीं दूसरी ओर अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।



इस मामले को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने लिखा कि जीत महतो की मौत के मामले में प्रशासन लीपापोती करने का काम कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि 29 तारीख की सुबह में लगभग 3 बजे जब पुलिस ने अजित को गिरफ्तार किया था, तब परिजनों ने स्पष्ट रूप से बताया था कि वह बीमार है। इसके बावजूद गिरफ्तारी के तुरंत बाद उसे अस्पताल क्यों नहीं ले जाया गया?


पूर्व मुख्यमंत्री सह केंद्रीय मंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा ने यह भी सवाल किया कि इतनी जल्दबाजी में पीड़ित परिवार को दो लाख रुपये किस मद से दिए गए? इस राशि की स्वीकृति किस आधार पर हुई और राज्य सरकार के किन-किन लोगों से इसके लिए पत्राचार किया गया? उन्होंने कहा कि जमशेदपुर एसपी के बयान से साफ होता है कि मामले में सच्चाई को दबाने की कोशिश की जा रही है। वहीं मोनू शर्मा, होम गार्ड, ड्राइवर पर 15 सालों से एक ही जगह पर कार्यरत है कई सारे आरोप लगाए गए हैं जो वर्मा माइंस की ओर से वसूली करता है और दो करोड़ रूपये का घर बनाकर कई जगह जमीन खरीदा है ।


वहीं सामाजिक कार्यकर्ता अरुण कुमार महतो ने भी इस मौत को लेकर तीखा सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि क्या एक झारखंडी युवक की जान की कीमत सिर्फ दो लाख रुपये है? उन्होंने आरोप लगाया कि जीत महतो को सिर्फ इसलिए थाना ले जाया गया क्योंकि उसने किसी से सस्ता मोबाइल खरीदा था। आरोप है कि बच्चन देव कुजूर, पटमदा डीएसपी के आदेश पर सचिन दास थाना प्रभारी mgm के साथ छापेमारी में कुल आठ पुलिसकर्मी की टीम आधी रात को उसे घर से उठाकर थाना ले गई, दो दिनों तक अमानवीय तरीके से मारपीट और टॉर्चर किया गया।

मृतक जीत महतों, और उसकी नवजात शिशु

अरुण कुमार महतो ने कहा कि हालत बिगड़ने पर जीत महतो को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन जहां उसे इलाज और न्याय मिलना चाहिए था, वहीं उसकी मौत हो गई। दुखद संयोग यह रहा कि उसी अस्पताल में उसकी पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया—एक तरफ नई जिंदगी का आगमन और दूसरी तरफ एक पिता की मौत।

उन्होंने इसे केवल एक मौत नहीं, बल्कि कानून, मानवाधिकार और लोकतंत्र की सामूहिक हत्या करार दिया। साथ ही मांग कि इस मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो और दोषी पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा चलाया जाए।

गौरतलब है कि जीत महतो परिवार का इकलौता कमाने वाला सदस्य था। पोस्टमार्टम वीडियोग्राफी के साथ कर शव परिजनों को सौंप दिया गया और अंतिम संस्कार किया गया। लेकिन अब यह मामला पुलिस कार्रवाई, प्रशासनिक जवाबदेही और मानवाधिकारों को लेकर एक बड़े सवाल के रूप में खड़ा हो गया है।

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