
रांची। केंद्रीय सरना समिति द्वारा शनिवार को कचहरी परिसर स्थित 13 आरआईटी बिल्डिंग के केंद्रीय कार्यालय में सरहुल पूजा को लेकर एक महत्वपूर्ण विचार-विमर्श बैठक आयोजित की गई। बैठक में सरहुल पर्व को रूढ़िवादी परंपरा और संस्कृति के अनुसार मनाने पर जोर दिया गया।
केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि सरहुल पूजा प्राकृतिक उपासक आदिवासियों का सबसे बड़ा और पवित्र पर्व है। इस पर्व के माध्यम से प्रकृति और पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण का संदेश मिलता है। उन्होंने बताया कि सरना स्थल और जाहेर स्थल पर पहान पुजारियों द्वारा मुर्गा (चेंगना) की बली देकर पूजा-अर्चना की जाती है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि सरहुल पूजा से पहले नए फल, फूल और सब्जियों का प्रयोग न करें। साथ ही घर, आंगन, अखाड़ा, सरना स्थल और गांव देवती स्थल की साफ-सफाई करें तथा प्रत्येक घर में सरना झंडा लगाया जाए।
केंद्रीय सरना समिति के प्रवक्ता एंजेल लकड़ा ने कहा कि सरहुल शोभायात्रा में डीजे या तेज आवाज वाले बाजों का प्रयोग न किया जाए। इसके बजाय पारंपरिक वाद्य यंत्र जैसे ढोल, नगाड़ा और मांदर के साथ शोभायात्रा निकाली जाए। उन्होंने कहा कि महिलाएं लाल पाड़ साड़ी और पुरुष धोती-गंजी पहनकर पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हों।
बैठक में केंद्रीय सरना समिति के महासचिव संजय तिर्की, संरक्षक भुवनेश्वर लोहार, प्रमोद एक्का, पंचम तिर्की, सोहन कच्छप समेत कई सदस्य उपस्थित थे।
