
बिहार चुनाव के साथ ही झारखंड की घाटशिला सीट का उपचुनाव भी होने की संभावना है। तारीखों का ऐलान भी बिहार चुनाव के साथ किया जाएगा। लेकिन उससे पहले ही घाटशिला बीजेपी के लिए चुनौती बन गई है। वजह है इस सीट पर पांच-पांच पूर्व मुख्य मंत्रियों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है।
झारखंड के कोल्हान क्षेत्र से अब तक कई मुख्यमंत्री चुने गए हैं। बाबूलाल मरांडी पांचवें पूर्व मुख्यमंत्री हैं और वर्तमान में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष हैं। वहीं हेमंत सोरेन और शिबू सोरेन का कनेक्शन संथाल परगना से है। शिबू सोरेन अब नहीं हैं, उनकी विरासत हेमंत संभाल रहे हैं। अर्जुन मुंडा, चंपाई सोरेन, मधुकोड़ा जगन्नाथपुर और रघुवर दास जैसे पूर्व सीएम भी इसी क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।

अब इस उपचुनाव में जेएमएम के उम्मीदवार सोमेश सोरेन, स्वर्गीय रामदास सोरेन के बेटे, इन चार पूर्व मुख्य मंत्रियों की विरासत वाली जमीन पर चुनाव लड़ेंगे। रामदास सोरेन तीन बार विधायक और घाटशिला के वरिष्ठ नेता रहे। उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में कई विकास योजनाएं लागू की थीं।
सोमेश ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बताया कि यह चुनाव सत्ता के लिए नहीं बल्कि घाटशिला के लोगों के अधिकार और सम्मान की लड़ाई है। पार्टी ने उन्हें सर्वसम्मति से उम्मीदवार घोषित किया है और संभावना है कि उन्हें मंत्री बनाकर चुनाव में उतारा जाए।
जेएमएम पहले भी इसी फार्मूले का सफल इस्तेमाल कर चुकी है। 2019 में पूर्व मंत्री हाजी हुसैन अंसारी के बेटे हफीजुल हसन और 2023 में दिवंगत मंत्री जगन्नाथ मेहतो की पत्नी बेबी देवी को मंत्री बनाकर उपचुनाव में उतारा गया और जीत हासिल हुई।

घाटशिला झारखंड मुक्ति मोर्चा का मजबूत गढ़ माना जाता है। 2019 के विधानसभा चुनाव में रामदास सोरेन ने यहां से 25,000 से अधिक वोटों से जीत हासिल की थी। इस क्षेत्र में आदिवासी मतदाता 40% से अधिक हैं, जिनमें जेएमएम की पकड़ मजबूत है। हेमंत सोरेन सरकार ने हाल ही में आदिवासी छात्रवृत्ति योजना और भूमि सुधार बिल जैसी योजनाएं लागू की हैं।
बीजेपी के लिए चुनौती यह है कि घाटशिला में चंपाई सोरेन की प्रतिष्ठा दांव पर है। उनके बेटे को मैदान में उतारा गया है और खुद चंपाई स्टार प्रचारक की भूमिका निभा सकते हैं। बीजेपी ने इस सीट पर सभी पूर्व सीएम, सांसद और विधायकों को भी प्रचार के लिए उतार दिया है।
कुल मिलाकर घाटशिला का यह उपचुनाव बेहद रोमांचक और निर्णायक होने वाला है। एक ओर सोमेश सोरेन के पास पिता की विरासत और सहानुभूति का माहौल है, वहीं बीजेपी के पास अनुभव और स्टार प्रचारकों की ताकत है। अब यह देखना बाकी है कि घाटशिला की जनता किसके पक्ष में अपना फैसला देती है।