रांची में नवनियुक्त सहायक आचार्यों के विद्यालय आवंटन पर सवाल, SOP की अनदेखी का आरोप ।

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रांची : झारखंड में शिक्षा व्यवस्था को सशक्त करने की दिशा में 28 नवंबर 2025 को नवनियुक्त सहायक आचार्यों (महिला, पुरुष एवं दिव्यांग) को माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा नियुक्ति पत्र प्रदान किया गया। यह क्षण हजारों शिक्षकों के जीवन का सपना था, लेकिन रांची जिले में विद्यालय आवंटन की प्रक्रिया ने इस सपने को कई शिक्षकों के लिए पीड़ा में बदल दिया है।

नवनियुक्त सहायक आचार्यों का आरोप है कि रांची जिले में विद्यालय आवंटन के दौरान निर्धारित मानक प्रक्रिया (SOP), मेरिट तथा महिला एवं दिव्यांग अभ्यर्थियों से जुड़े मानवीय, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी पहलुओं को गंभीरता से नजरअंदाज किया गया। SOP के अनुसार शिक्षकों को उनके गृह प्रखंड या नजदीकी क्षेत्र में 10 से 20 किलोमीटर की दूरी के भीतर पदस्थापन किया जाना था, लेकिन रांची जिले में बड़ी संख्या में शिक्षकों को उनके गृह प्रखंड से 48 किलोमीटर से लेकर 150 किलोमीटर तक दूर, दुर्गम और सुदूर प्रखंडों में विद्यालय आवंटित कर दिए गए।

इस स्थिति से महिला शिक्षकों, दिव्यांग शिक्षकों तथा पुरुष शिक्षकों सभी को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। प्रतिदिन लंबी दूरी का आवागमन, अतिरिक्त आर्थिक बोझ, मानसिक तनाव और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन में गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। शिक्षकों का कहना है कि इसका सीधा असर उनके शिक्षण कार्य और विद्यार्थियों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है, जो भविष्य के लिए चिंताजनक है।

यह तथ्य भी सामने आया है कि राज्य के अन्य जिलों—जैसे हजारीबाग, गोड्डा, दुमका, गढ़वा और देवघर में विद्यालय आवंटन के दौरान SOP का विधिवत पालन किया गया। इन जिलों में महिला, दिव्यांग और मेरिटधारी अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देते हुए उनके गृह प्रखंड या समीपवर्ती प्रखंडों में 15 से 20 किलोमीटर की दूरी के भीतर ही पदस्थापन दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि SOP का समान रूप से पालन संभव था, लेकिन रांची जिले में इसे लागू नहीं किया गया।

रांची जिले के नवनियुक्त शिक्षक-शिक्षिकाएं और दिव्यांग शिक्षक आज भी शिक्षा विभाग एवं राज्य के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों से न्याय की उम्मीद लगाए हुए हैं। उनकी मांग है कि वर्तमान पदस्थापन को रद्द कर पुनः SOP के अनुसार पारदर्शी प्रक्रिया अपनाते हुए उन्हें उनके नजदीकी विद्यालयों में पदस्थापित किया जाए, ताकि वे बिना मानसिक दबाव के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकें।

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