
झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय महासचिव विनोद कुमार पांडेय ने भाजपा की दोहरी नीति, परिवारवाद और सत्ता के दुरुपयोग पर तीखा सवाल खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा का बयान न सिर्फ़ तथ्यों से परे है, बल्कि उसकी अवसरवादी राजनीति को भी उजागर करता है।
जब हेमंत सोरेन वैश्विक मंच World Economic Forum (दावोस) में झारखंड के लिए निवेश लाने जाते हैं, तो भाजपा इसे “पर्यटन यात्रा” बताती है। लेकिन जब भारतीय जनता पार्टी शासित महाराष्ट्र की सरकार दावोस में निजी कंपनियों से समझौते करती है, तब वही कदम “विकास का मॉडल” बन जाता है।
महासचिव पांडेय ने सवाल किया कि महाराष्ट्र की भाजपा सरकार द्वारा दावोस में लोढ़ा डेवलपर्स लिमिटेड के साथ किए गए प्रारंभिक निवेश समझौते पर भाजपा की क्या राय है? यही नहीं, चार महीने पहले इसी कंपनी के साथ एमओयू भी साइन किया गया था।
सच्चाई यह है कि लोढ़ा डेवलपर्स के मालिक मंगल प्रभात लोढ़ा महाराष्ट्र सरकार में भाजपा के मंत्री हैं, और दावोस में एमओयू पर हस्ताक्षर करने वाले उनके पुत्र अभिषेक लोढ़ा हैं।
ऐसे में सवाल स्वाभाविक है—
क्या यह हितों का टकराव नहीं है?
क्या यह पर्यटन नहीं कहलाएगा?
या फिर भाजपा के लिए दावोस केवल तब गलत होता है, जब वहां गैर-भाजपा मुख्यमंत्री मौजूद हों?
उन्होंने कहा कि भाजपा नेता टाटा और इंफोसिस के पते गिनाने से पहले यह स्पष्ट करें कि क्या आज के वैश्विक निवेश निर्णय गली-मोहल्ले की बैठकों में होते हैं? दावोस जैसे मंच पर निवेश का अर्थ होता है—ग्लोबल स्ट्रैटेजी, सप्लाई चेन, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं और दीर्घकालिक साझेदारी।
महासचिव पांडेय ने आगे कहा कि जब झारखंड के मुख्यमंत्री दुनिया के सामने राज्य की संभावनाएं रखते हैं, तो भाजपा को जलन होती है। लेकिन जब उनके अपने मंत्री का परिवार दावोस में समझौते करता है, तब भाजपा को न नैतिकता याद आती है, न सिद्धांत।
एमएसएमई और स्थानीय उद्योगों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि झामुमो सरकार ने ही पहली बार नीतिगत सुधारों, निवेश नीति और औद्योगिक प्रोत्साहन को जमीनी स्तर तक पहुंचाया है। इसी का परिणाम है कि आज झारखंड वैश्विक निवेश मानचित्र पर मजबूती से उभर रहा है।
अंत में भाजपा से सीधा सवाल है—
अगर दावोस में झारखंड का जाना अपराध है, तो दावोस में महाराष्ट्र का जाना पुण्य कैसे हो गया?
भाजपा पहले अपनी दोहरी नीति, परिवारवाद और सत्ता के दुरुपयोग पर जवाब दे, फिर झारखंड के मुख्यमंत्री पर उंगली उठाए। झारखंड को अब ट्रोल नहीं, वैश्विक पहचान चाहिए—और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन वही कर रहे हैं।