
झारखंड की राजनीति और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। मामला एक ऐसे गरीब आदिवासी पिता से जुड़ा है, जिसे अपने चार महीने के मृत बेटे का शव झोले में लेकर जाना पड़ा, क्योंकि सरकारी सिस्टम ने उसे एंबुलेंस, 108/100 वाहन या कोई वैकल्पिक सुविधा उपलब्ध नहीं कराई।
इस पूरे मामले ने तब और गंभीर मोड़ ले लिया जब झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी का एक वीडियो सामने आया, जिसमें वे इस घटना को लेकर हंसते हुए टिप्पणी करते नजर आए। मंत्री का यह रवैया न केवल एक पीड़ित पिता के दर्द का मजाक उड़ाता प्रतीत होता है, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है।

जानकारी के अनुसार, मृत बच्चे के पिता डिंबा चतुंबा के पास महज ₹100 थे। ₹20 में उन्होंने झोला खरीदा और बाकी पैसे बस किराए के लिए बचाए। जिस सरकारी अस्पताल में बच्चे की मौत हुई, वहीं से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं दी गई। न एंबुलेंस, न कोई वैकल्पिक इंतजाम। मजबूरी में पिता को अपने बेटे का शव झोले में लेकर जाना पड़ा।
मंत्री द्वारा पहले मीडिया पर “भ्रामक खबरें” फैलाने का आरोप लगाना और बाद में उसी पिता की हालत पर हंसते हुए सवाल खड़ा करना, प्रशासनिक संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है। सवाल यह नहीं है कि खबर भ्रामक थी या नहीं, सवाल यह है कि क्या एक स्वास्थ्य मंत्री का पहला कर्तव्य संवेदना और जवाबदेही नहीं होना चाहिए था?
आज झारखंड पूछ रहा है—
क्या गरीब का दुख इतना सस्ता हो गया है कि उस पर ठहाके लगाए जाएं?
क्या सत्ता के घमंड में मानवीय पीड़ा को मजाक बनाया जा सकता है?
यह मामला सिर्फ एक बयान का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो सत्ता में बैठकर भी आम आदमी के दर्द को समझने में असफल रहती है। सत्ता बहुत कुछ माफ कर सकती है, लेकिन इतिहास ऐसे बयानों को कभी माफ नहीं करता।