दुमका में गरजे ‘झारखंड टाइगर’ चम्पाई सोरेन, बोले – आदिवासी विरोधी पेसा नियमावली को फाड़ कर फेंक देंगे ।

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दुमका। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन सोमवार को दुमका पहुंचे, जहां उन्होंने दिसोम मांझी थान में मत्था टेककर आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व की रक्षा के संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया। इसके बाद वे एस. पी. कॉलेज में आयोजित संथाल परगना के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन “दिसोम सोहराय” में शामिल हुए।


कार्यक्रम स्थल से लगभग एक किलोमीटर पहले ही उनके स्वागत के लिए हजारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े। इसी दौरान चम्पाई सोरेन अपने समर्थकों के साथ पैदल ही आगे बढ़े। माहौल उस समय और भी उत्साहपूर्ण हो गया, जब उन्होंने कलाकारों से मांदर लेकर उनके साथ ताल से ताल मिलाते हुए नृत्य किया। पारंपरिक अंदाज़ में उनका भव्य स्वागत किया गया।


अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने संथाल परगना के वीर शहीदों को नमन करते हुए की। उन्होंने कहा कि सोहराय जैसे पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और पहचान के प्रतीक हैं, जिन्हें सहेजकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।

पूर्व सीएम ने राज्य सरकार पर पेसा नियमावली के नाम पर आदिवासियों को धोखा देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि पेसा अधिनियम 1996 राज्यों को आदिवासी समाज की रूढ़िजन्य परंपराओं, सामाजिक-धार्मिक प्रथाओं और पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अनुरूप नियम बनाने का स्पष्ट निर्देश देता है, लेकिन झारखंड सरकार की नियमावली में ये प्रावधान पूरी तरह गायब हैं।


उन्होंने आरोप लगाया कि टीएसी और अब पेसा से राज्यपाल को बाहर कर अधिकार उपायुक्तों को सौंपे जा रहे हैं, ताकि सरकार पूरे तंत्र पर नियंत्रण रख सके। यह पेसा की मूल भावना के विरुद्ध है। ग्राम सभाओं के अधिकारों में की गई कटौती को उन्होंने “अक्षम्य” बताया।


चम्पाई सोरेन ने कहा कि उनके कार्यकाल में बनी पेसा नियमावली में न सिर्फ परंपरागत प्रथाओं का उल्लेख था, बल्कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट उल्लंघन के मामलों में ग्राम सभा को जमीन वापस दिलाने का अधिकार भी दिया गया था। साथ ही, शेड्यूल एरिया की जमीन के हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य की गई थी।


उन्होंने कहा कि मौजूदा महागठबंधन सरकार पेसा को कमजोर कर आदिवासी समाज के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है। पहले से ही घुसपैठ और धर्मांतरण जैसी समस्याओं से जूझ रहे आदिवासी समाज को पेसा से उम्मीदें थीं, लेकिन सरकार की नियमावली ने उन पर पानी फेर दिया।
पूर्व सीएम ने ऐलान किया कि वे पारंपरिक ग्राम प्रधानों के बीच इस नियमावली को फाड़कर फेंकेंगे।


अपने भाषण के अंत में उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि जल-जंगल-जमीन की रक्षा के लिए फिर एक बार बड़े आंदोलन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वे गांव-गांव जाकर सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक करेंगे।


इस ऐतिहासिक सोहराय आयोजन में संथाल परगना के कई साहित्यकार, शिक्षाविद, समाजसेवी और लाखों की संख्या में आम लोग मौजूद रहे।

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