बहुभाषी शिक्षा ही झारखंड की सांस्कृतिक पहचान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की नींव : सुदिव्य कुमार

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झारखंड सरकार के माननीय उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा है कि झारखंड भाषायी विविधता का जीवंत उदाहरण है, जहाँ “कोस-कोस पर पानी बदले, दस कोस पर वाणी” की कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है। उन्होंने कहा कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान, समावेशिता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का आधार बहुभाषी शिक्षा है।
वे होटल चाणक्या बी.एन.आर. में आयोजित बहुभाषी शिक्षा पर राष्ट्रीय कॉन्क्लेव के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। यह दो दिवसीय राष्ट्रीय कॉन्क्लेव 07 से 08 जनवरी 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।

माननीय मंत्री ने मातृभाषा आधारित शिक्षा के वैज्ञानिक और भावनात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि माँ ही बच्चे की पहली शिक्षिका होती है, इसलिए ‘मदर टंग’ की अवधारणा शिक्षा की नींव है। यदि प्रारंभिक शिक्षा सरल, रोचक और व्यवहारिक नहीं होगी, तो वह केवल ब्लैकबोर्ड तक सीमित रह जाएगी और जागरूक नागरिकों का निर्माण नहीं कर पाएगी।

उन्होंने चिंता जताई कि आज कई जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएँ लुप्त होने की कगार पर हैं। बच्चों को उनकी अपनी भाषा में शिक्षा देना इन भाषाओं के संरक्षण का सबसे प्रभावी माध्यम है। खोरठा भाषा का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से ही भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियाँ और पहचान जीवित रह सकती हैं।

श्री सुदिव्य कुमार ने बताया कि वर्तमान में पलाश परियोजना राज्य के केवल 8 जिलों में संचालित है, जबकि इसे शेष 16 जिलों तक विस्तारित करने की आवश्यकता है। उन्होंने खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुरमाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में सशक्त रूप से शामिल करने पर बल दिया।

इस अवसर पर बहुभाषी शैक्षणिक सामग्री निर्माण में योगदान देने वाली छात्राओं और शिक्षकों को सम्मानित किया गया। मंत्री ने कहा कि राज्य स्तर पर दिया गया यह सम्मान अन्य शिक्षकों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा। साथ ही, देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए उन्होंने विश्वास जताया कि यह राष्ट्रीय कॉन्क्लेव झारखंड की स्कूली शिक्षा को नई दिशा देगा।

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