
रांची: 30 अगस्त 2026 को आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान रैली को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। रैली को लेकर कुछ लोगों द्वारा इसे कभी “चर्च प्रायोजित” तो कभी “कांग्रेसी रैली” बताए जाने पर सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

लक्ष्मीनारायण मुंडा का कहना है कि आदिवासी एकता महाजुटान किसी एक राजनीतिक दल या धर्म की रैली नहीं थी, बल्कि आदिवासियों के अस्तित्व और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आयोजित की गई थी।
उन्होंने कहा कि रैली का मुख्य उद्देश्य परिसीमन की आड़ में आदिवासियों की आरक्षित सीटों को कम किए जाने की आशंका के खिलाफ आवाज उठाना था। उनके अनुसार, रैली में आदिवासी समुदाय के विभिन्न सामाजिक संगठनों, कार्यकर्ताओं और नेताओं ने हिस्सा लिया और सभी राजनीतिक दलों से जुड़े आदिवासी नेताओं और कार्यकर्ताओं से भी इसमें शामिल होने की अपील की गई थी।

मुंडा ने रैली को “चर्च प्रायोजित” बताए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि ईसाई आदिवासी भी आदिवासी हैं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 342 का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जनजाति की पहचान के लिए धर्म को आधार नहीं बनाया गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक प्रावधान अलग हैं। उनके मुताबिक, ST समुदाय के लिए धर्म परिवर्तन के कारण अनुसूचित जनजाति की पहचान समाप्त होने का वैसा प्रावधान नहीं है, जैसा SC के मामले में लागू होता है।
लक्ष्मीनारायण मुंडा ने भाजपा और हिंदूवादी संगठनों पर आदिवासियों को धर्म और राजनीति के नाम पर बांटने का आरोप लगाया। उन्होंने भाजपा नेताओं जॉन बारला और लुईस मरांडी का उदाहरण देते हुए सवाल किया कि जब ईसाई आदिवासी भाजपा के साथ रहे, तब उन पर सवाल क्यों नहीं उठाए गए।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान केवल धर्म से नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ी है। इसलिए किसी रैली को चर्च या कांग्रेस का लेबल लगाकर खारिज करना आदिवासी एकता को कमजोर करने की कोशिश है।
लक्ष्मीनारायण मुंडा ने स्पष्ट कहा कि आदिवासी एकता महाजुटान रैली का उद्देश्य आदिवासियों की एकता और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की आवाज उठाना था।