रांची, झारखंड: झारखंड की आदिवासी परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक ऐतिहासिक मुड़मा जतरा के मूल स्वरूप को लेकर लक्ष्मीनारायण मुंडा ने चिंता जताई है। उन्होंने अपने लेख में आरोप लगाया है कि जतरा का पारंपरिक और सांस्कृतिक महत्व धीरे-धीरे व्यावसायिक गतिविधियों, राजनीतिक भाषणों और धार्मिक प्रचार के बीच कमजोर पड़ रहा है।

लक्ष्मीनारायण मुंडा के अनुसार, मुड़मा जतरा केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संबंधों, पूर्वजों की स्मृति और मुंडा-उरांव समुदायों के बीच भाईचारे का प्रतीक है। उन्होंने इसके पारंपरिक स्वरूप को संरक्षित करने और सामुदायिक एकजुटता को मजबूत करने की अपील की है।
क्या है मुड़मा जतरा का ऐतिहासिक महत्व?
अपने लेख में लक्ष्मीनारायण मुंडा ने लोककथाओं और मौखिक इतिहास का उल्लेख करते हुए मुड़मा जतरा की परंपरा को लगभग 450 से 500 वर्ष पुराना बताया है। उनके अनुसार, रोहतासगढ़ से उरांव समुदाय के पलायन के बाद छोटानागपुर क्षेत्र में मुंडा समुदाय के साथ उनके संबंध विकसित हुए।
लेख में कहा गया है कि स्थानीय मुंडा समुदाय ने उरांव समुदाय को क्षेत्र में बसने की अनुमति दी थी। इसी ऐतिहासिक स्मृति और दोनों समुदायों के बीच भाईचारे को याद रखने के लिए मुड़मा में जतरा आयोजित करने की परंपरा विकसित हुई।
हालांकि, इस ऐतिहासिक विवरण की स्वतंत्र पुष्टि के लिए ऐतिहासिक और शोधपरक स्रोतों का संदर्भ आवश्यक है।
जतरा के व्यावसायीकरण पर उठाए सवाल
लक्ष्मीनारायण मुंडा ने अपने लेख में कहा है कि मुड़मा जतरा में पारंपरिक पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ दुकानों, व्यावसायिक गतिविधियों, राजनीतिक भाषणों और प्रचार का प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस बदलाव के कारण जतरा के मूल उद्देश्य और सांस्कृतिक महत्व पर असर पड़ रहा है। उनके विचार में, इस आयोजन का केंद्र चालीस पड़हा की सामूहिकता, पूर्वजों की स्मृति और आदिवासी समुदायों के बीच आपसी संबंध होने चाहिए।
उन्होंने सरना धर्म के नाम पर नेतृत्व करने वाले कुछ लोगों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि, लेख में लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है और संबंधित पक्षों का जवाब भी उपलब्ध नहीं है।
शक्ति खूंटा और चालीस पड़हा की परंपरा
मुड़मा जतरा की परंपरा में शक्ति खूंटा और चालीस पड़हा के पाहनों की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। लेखक के अनुसार, इन परंपराओं का संरक्षण और सम्मान आयोजन की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए जरूरी है।
उन्होंने चिंता जताई कि यदि पारंपरिक रीति-रिवाजों की जगह प्रचार और व्यावसायिक गतिविधियां प्रमुख हो गईं, तो आने वाली पीढ़ियां जतरा के वास्तविक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व से दूर हो सकती हैं।
आदिवासी समाज से एकजुट होने की अपील
लक्ष्मीनारायण मुंडा ने अपने लेख में आदिवासी समाज से अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आगे आने की अपील की है। उन्होंने मुंडा और उरांव समुदायों के ऐतिहासिक संबंधों तथा आपसी भाईचारे को मजबूत करने पर जोर दिया।
उनका कहना है कि मुड़मा जतरा की पहचान केवल भीड़ या व्यावसायिक गतिविधियों से नहीं, बल्कि उसकी परंपराओं, सामुदायिक एकता और पूर्वजों की स्मृति से होनी चाहिए।
लेख के अंत में उन्होंने मुड़मा जतरा के पारंपरिक स्वरूप को संरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि समाज को अपनी आस्था, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के प्रति जागरूक होना होगा।