
रांची: किसी सामाजिक कार्यकर्ता या आंदोलनकारी की जीवनसंगिनी होना आसान नहीं होता। जब पति आंदोलन के कारण भूमिगत हों, जेल जाते हों या पुलिस और प्रशासन का दबाव परिवार तक पहुंचता हो, तब घर और बच्चों की पूरी जिम्मेदारी पत्नी के कंधों पर आ जाती है। झारखंड आंदोलन के दौरान शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी रूपी सोरेन ने भी ऐसे ही कठिन दौर का सामना किया।
1962 में शिबू सोरेन और रूपी किस्कू का विवाह हुआ। विवाह के शुरुआती दौर में ही शिबू सोरेन को जेल जाना पड़ा। नई-नवेली दुल्हन के सामने आर्थिक संकट और परिवार की जिम्मेदारी थी, लेकिन रूपी सोरेन ने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। उन्होंने पति से मिलने जेल तक का सफर किया और परिवार को संभालते हुए उनके संघर्ष में मूक सहयात्री बनी रहीं।
संघर्ष के दिनों में घर की मजबूत दीवार बनीं रूपी सोरेन
झारखंड आंदोलन के दौर में शिबू सोरेन अक्सर जंगलों और पहाड़ों में रहते थे। दूसरी ओर घर पर पुलिस की पूछताछ, प्रशासन का दबाव और जमीन से जुड़े विवाद जैसी चुनौतियां बनी रहती थीं। ऐसे समय में रूपी सोरेन ने परिवार और जमीन की जिम्मेदारी मजबूती से संभाली।

कहा जाता है कि जब महाजन जमीन पर कब्जा करने पहुंचे और शिबू सोरेन जेल में थे, तब रूपी सोरेन ने हसुआ हाथ में लेकर उनका सामना किया। यह घटना उनके साहस और अपनी जमीन के प्रति उनके संघर्ष का प्रतीक बन गई।
एक समय जब शिबू सोरेन लंबे समय तक घर से दूर रहे, तो रूपी सोरेन अपने छोटे बेटे दुर्गा को गोद में लेकर अपनी सास और ननद के साथ उन्हें खोजने जंगल-पहाड़ों की ओर निकल पड़ीं। यह सिर्फ एक पत्नी की अपने पति को खोजने की बेचैनी नहीं थी, बल्कि उस दौर की कठिन परिस्थितियों में एक परिवार को संभालने का संघर्ष भी था।
बच्चों की परवरिश के साथ संघर्ष की विरासत
रूपी सोरेन ने अपने बच्चों अंजली, दुर्गा, हेमंत और बसंत की परवरिश ऐसे दौर में की, जब परिवार का जीवन लगातार संघर्षों से घिरा था। उन्होंने बच्चों को सिर्फ परिवार की जिम्मेदारियों के बीच बड़ा नहीं किया, बल्कि हक और अधिकार के लिए संघर्ष की भावना भी दी।
झारखंडी समाज में आंदोलनकारियों के परिवार की महिलाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। आंदोलन जब सड़कों, जंगलों और राजनीतिक मंचों पर चलता है, तब परिवार की जिम्मेदारी अक्सर घर की महिलाओं के कंधों पर होती है। रूपी सोरेन इसी अदृश्य लेकिन मजबूत शक्ति का प्रतीक थीं।
चुनावी राजनीति में भी उतरीं, फिर परिवार को समर्पित कर दिया जीवन
1999 में रूपी सोरेन को दुमका लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया। हालांकि उन्हें चुनाव में सफलता नहीं मिली, लेकिन इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाकर परिवार और शिबू सोरेन के साथ को प्राथमिकता दी।
शिबू सोरेन के अंतिम दिनों तक रूपी सोरेन उनके साथ रहीं। पद्म भूषण सम्मान के दौरान व्हीलचेयर पर मौजूद रूपी सोरेन को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया जाना उनके लंबे संघर्ष और समर्पण की सार्वजनिक पहचान के तौर पर देखा गया।
शिबू सोरेन के बाद रूपी सोरेन का भी निधन

शिबू सोरेन के निधन के करीब एक वर्ष बाद रूपी सोरेन ने भी दुनिया को अलविदा कह दिया। दोनों के जीवन के बीच संघर्ष, साथ और बिछड़ने की यह कहानी झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक यात्रा से गहराई से जुड़ी रही।
आज रूपी सोरेन हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी उन तमाम महिलाओं की कहानी है, जो आंदोलनकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के पीछे रहकर परिवार को संभालती हैं।
रूपी सोरेन ने मंच से शायद बहुत कम आवाज उठाई, लेकिन घर की चौखट पर उनका साहस किसी आंदोलन से कम नहीं था। जेल, पुलिस, प्रशासन, आर्थिक संकट और जमीन से जुड़े संघर्षों के बीच उनका अडिग रहना उन्हें झारखंड के सामाजिक इतिहास में एक अलग पहचान देता है।
रूपी सोरेन को नमन—उस साहसी महिला को, जिन्होंने संघर्ष के दौर में परिवार की जड़ों को मजबूत बनाए रखा और अपने जीवनसाथी के आंदोलन को घर के भीतर से मजबूती दी।