
रांची | धर्मांतरण के मुद्दे पर देश की सर्वोच्च अदालत के हालिया फैसले का केंद्रीय सरना समिति ने स्वागत किया है। समिति के केंद्रीय अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने शुक्रवार को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस निर्णय को जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
उन्होंने बताया कि 16 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने Digbal Tandi बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य (Diary No. 64814/2025) मामले में सुनवाई करते हुए ग्राम सभाओं द्वारा बाहरी हस्तक्षेप, विशेषकर मिशनरी गतिविधियों पर लगाए गए प्रतिबंधों को उचित ठहराया। अदालत ने कहा कि ऐसे कदम जनजातीय समुदायों की परंपराओं, संस्कृति और सामाजिक एकता की रक्षा के लिए आवश्यक हो सकते हैं।
फूलचंद तिर्की ने इस फैसले को ऐतिहासिक संदर्भों से जोड़ते हुए कहा कि महान आदिवासी नेता बिरसा मुंडा और कार्तिक उरांव ने भी समय-समय पर जनजातीय समाज की पहचान और परंपराओं को बनाए रखने पर जोर दिया था।
उन्होंने कानूनी परिप्रेक्ष्य में 1977 के Rev. Stainislaus बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता है, लेकिन किसी को बलपूर्वक, प्रलोभन या धोखे से धर्मांतरण कराना मौलिक अधिकार नहीं है।
प्रेस विज्ञप्ति में यह चिंता भी जताई गई कि वर्तमान समय में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं का उपयोग कुछ मामलों में धर्मांतरण के साधन के रूप में किया जा रहा है, जिससे जनजातीय समाज में सामाजिक असंतुलन और सांस्कृतिक क्षरण की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
इसके साथ ही पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) का जिक्र करते हुए कहा गया कि यह कानून ग्राम सभाओं को अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा करने का अधिकार देता है। हालिया न्यायिक टिप्पणियां इस अधिकार को और मजबूत करती हैं।
अंत में, केंद्रीय सरना समिति ने कहा कि जनजातीय अस्मिता का संरक्षण भारत की सांस्कृतिक विविधता को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है और इस दिशा में समाज, प्रशासन और न्याय व्यवस्था की संयुक्त भूमिका जरूरी है।