
झारखंड के चतरा जिले में स्थित इटखोरी प्रखंड मुख्यालय धार्मिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह स्थल चतरा से लगभग 35 किलोमीटर पूर्व, जीटी रोड से जुड़े चौपारण से 16 किलोमीटर पश्चिम तथा महानद (महाने) नदी के तट पर, पहाड़ों और जंगलों से घिरा हुआ स्थित है।
इटखोरी का यह पवित्र क्षेत्र भद्रकाली परिसर से मात्र आधा किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है।
इटखोरी को शुरू से ही तीन धर्मों — सनातन, बौद्ध और जैन धर्म — के अद्वितीय संगम स्थल के रूप में जाना जाता है। सनातन धर्मावलंबियों की आराध्य मां भद्रकाली, बौद्ध धर्म में पूज्य देवी मां तारा, तथा जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर स्वामी शीतलनाथ की जन्मभूमि भदलपुर — तीनों की मान्यता इसी पावन क्षेत्र से जुड़ी हुई है। जैन धर्मावलंबी इस स्थल को भदुली माता मंदिर के नाम से भी जानते हैं।
🏛️ प्राचीन इतिहास और पुरातात्विक महत्व

इटखोरी क्षेत्र में 200 ईसा पूर्व से 1200 ईस्वी के बीच के अनेक बौद्ध अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां का सबसे प्रमुख आकर्षण 9वीं शताब्दी का भव्य मां भद्रकाली मंदिर परिसर है, जो क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है। मंदिर परिसर में स्थापित मां भद्रकाली की प्रतिमा कीमती काले पत्थर से निर्मित लगभग पांच फीट ऊंची चतुर्भुज प्रतिमा है। प्रतिमा के चरणों के नीचे ब्राह्मी लिपि में अंकित शिलालेख के अनुसार इसका निर्माण राजा महेंद्र पाल द्वितीय द्वारा नौवीं शताब्दी में कराया गया था।
मां भद्रकाली मंदिर से सटे शिव मंदिर में स्थित सहस्र शिवलिंग इस परिसर की अनूठी पहचान है। एक ही पत्थर को तराश कर बनाए गए इस शिवलिंग में 1008 शिवलिंग उत्कीर्ण हैं। विशेष मान्यता है कि जलाभिषेक करने पर एक साथ सभी 1008 शिवलिंगों का अभिषेक होता है। मंदिर के सामने नंदी की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है।

☸️ बौद्ध स्तूप और जैन अवशेष
मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन बौद्ध स्तूप, जिसे मनौती स्तूप भी कहा जाता है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस स्तूप में भगवान बुद्ध की 1004 छोटी एवं 4 बड़ी प्रतिमाएं स्थापित हैं। एक प्रतिमा भगवान बुद्ध को महापरिनिर्वाण मुद्रा में दर्शाती है। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह स्तूप भी नौवीं शताब्दी का है। लोककथाओं के अनुसार, सम्राट अशोक द्वारा निर्मित 84,000 स्तूपों में यह भी शामिल माना जाता है। स्तूप के ऊपरी हिस्से में स्वतः जल संग्रह होना आज भी शोध और आश्चर्य का विषय है।
परिसर के संग्रहालय में जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ स्वामी का चरण चिह्न सुरक्षित है, जो वर्ष 1983 में ग्रामीणों को खुदाई के दौरान प्राप्त हुआ था। साथ ही प्राप्त ताम्रपत्र में ब्राह्मी लिपि के माध्यम से इस स्थल को भगवान शीतलनाथ की जन्मभूमि बताया गया है। वर्तमान में जिला प्रशासन द्वारा शीतलनाथ तीर्थ क्षेत्र समिति को लगभग ढ़ाई एकड़ भूमि मंदिर व धर्मशाला निर्माण हेतु उपलब्ध कराई गई है।
🛕 पौराणिक मान्यताएं
मान्यता है कि शांति की खोज में निकले युवराज गौतम बुद्ध (सिद्धार्थ) ने यहां तपस्या की थी। जब उनकी माता उन्हें वापस ले जाने आईं और ध्यान भंग न हुआ तो उनके मुख से “इतखोई” शब्द निकला, जो कालांतर में इटखोरी कहलाया। इसके अलावा भगवान राम के वनवास और पांडवों के अज्ञातवास से भी इस स्थल का पौराणिक संबंध बताया जाता है।
🚗 कैसे पहुंचें
इटखोरी मंदिर परिसर राज्य की राजधानी रांची से लगभग 150 किमी, जिला मुख्यालय चतरा से 35 किमी और प्रमंडलीय मुख्यालय हजारीबाग से 50 किमी दूर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोडरमा (56 किमी) तथा निकटतम हवाई अड्डा बोधगया (90 किमी) है।