
भ्रामक दावों से PGT विवाद में गढ़ा जा रहा नया नैरेटिव? नियुक्ति पत्र और पूरे आंकड़े खोलेंगे सच्चाई
PGT परीक्षा एवं चयन प्रक्रिया को लेकर चल रहे विवाद के बीच कुछ ऐसे दावे सामने आ रहे हैं, जिन पर तथ्यों और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठना स्वाभाविक है। मुद्दा विरोध का नहीं, बल्कि सही तथ्य समाज के सामने रखने का है।
‘PGT टॉपर’ का दावा कितना सही?
अभय तिवारी को PGT का ‘टॉपर’ बताया जा रहा है। इसके लिए विरोधी समूह की ओर से उनका पोस्टिंग पत्र दिखाया जा रहा है। जबकि यद्यपि पोस्टिंग पत्र में नाम Alphabetical Order में हैं, इसलिए उसमें नाम का क्रम मेरिट का प्रमाण नहीं हो सकता।

वास्तविक मेरिट और चयन किस श्रेणी में हुआ है, यह नियुक्ति पत्र एवं आधिकारिक चयन/मेरिट दस्तावेज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार अभय तिवारी का मेरिट क्रमांक 140 है और उनका चयन EWS श्रेणी में हुआ है। ऐसे में सवाल यह है कि जब नियुक्ति पत्र से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है, तो Alphabetical Order वाले पोस्टिंग पत्र को आधार बनाकर उन्हें ‘PGT टॉपर’ क्यों बताया जा रहा है?
यह उनके चयन पर सवाल नहीं, बल्कि तथ्यों को सही संदर्भ में प्रस्तुत करने का सवाल है।
चार केंद्रों से 60% चयन का दावा
इसी तरह यह दावा किया जा रहा है कि PGT में 60% से अधिक चयन केवल चार केंद्रों से हुआ। यदि ऐसा है तो इसकी जांच होनी चाहिए। लेकिन केवल चयनित अभ्यर्थियों की संख्या बताना पर्याप्त नहीं है।

यह भी बताना जरूरी है कि—
कुल कितने अभ्यर्थियों ने परीक्षा दी, उन चार केंद्रों पर कितने परीक्षार्थी थे और वहां से कुल कितने का चयन हुआ?
क्योंकि केवल चयनितों की संख्या से निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। वास्तविक तस्वीर के लिए कुल परीक्षार्थी बनाम कुल चयन का अनुपात (Selection Ratio) देखना होगा।
समाज अधूरी जानकारी पर नहीं, पूरे साक्ष्य पर राय बनाए
आज सोशल मीडिया पर एक अधूरा आंकड़ा भी कुछ ही समय में हजारों लोगों तक पहुंच जाता है और धीरे-धीरे वही ‘सच’ के रूप में स्थापित होने लगता है।

इसलिए समाज को किसी भी दावे पर प्रतिक्रिया देने से पहले यह देखना चाहिए कि उसके पीछे पूरा आधिकारिक दस्तावेज और संपूर्ण आंकड़ा है या नहीं।
«दावे बहुत हैं, साक्ष्य भी दिखाइए,
जो सच है, उसे पूरा बताइए।
आधे आंकड़ों से भ्रम न फैलाइए,
पूरी तस्वीर समाज को दिखाइए।»

यदि चयन प्रक्रिया में वास्तव में कोई अनियमितता हुई है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन उसी तरह भ्रामक दस्तावेज या अधूरे आंकड़ों के आधार पर पूरे समाज में गलत धारणा बनाना भी उचित नहीं है।
पोस्टिंग पत्र का Alphabetical Order मेरिट नहीं बताता और केवल चयनित अभ्यर्थियों की संख्या अनियमितता सिद्ध नहीं करती।
इसलिए जरूरत किसी पक्ष के समर्थन या विरोध की नहीं, बल्कि पूरे साक्ष्य, आधिकारिक दस्तावेज और संपूर्ण आंकड़ों के आधार पर सच सामने लाने की है।