
प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय गायिका, संगीतज्ञ और शिक्षाविद प्रो. मंगला कपूर ने भारतीय संगीत जगत में अपने उत्कृष्ट योगदान से एक विशेष पहचान बनाई है। 15 जनवरी 1954 को वाराणसी में जन्मी प्रो. कपूर ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत में एम. म्यूजिक तथा पीएच.डी. की उपाधि स्वर्ण पदक के साथ प्राप्त की। उन्होंने पंडित चित्ररंजन ज्योतिषी के मार्गदर्शन में अपना शोध कार्य पूर्ण किया।
भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ और साधना के लिए उन्होंने पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा का अनुसरण किया तथा पंडित सुरेंद्र मोहन मिश्रा से ग्वालियर घराने और अर्ध-शास्त्रीय संगीत का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया। तीन दशकों से अधिक समय तक उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में शिक्षण, अनुसंधान, पाठ्यक्रम विकास और अकादमिक प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2019 में वे संगीत विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुईं।

प्रो. मंगला कपूर ने संगीत प्रदर्शन, शिक्षण और शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है। उन्होंने संगीत विषय पर पांच महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें उनकी आत्मकथा “सीरत” भी शामिल है। उनके कार्यों ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपराओं के संरक्षण, प्रलेखन और प्रसार को नई दिशा प्रदान की है।
देश के विभिन्न प्रतिष्ठित सांस्कृतिक आयोजनों जैसे गंगा महोत्सव, सुबह-ए-बनारस और बुढ़वा मंगल में उनके संगीत प्रदर्शन को व्यापक सराहना मिली है। इसके साथ ही वे प्रोफेसर मंगला कपूर फाउंडेशन की संस्थापक हैं, जहां आर्थिक रूप से कमजोर और दिव्यांग व्यक्तियों को निःशुल्क संगीत शिक्षा प्रदान की जाती है।
संगीत और समाज के प्रति उनके अमूल्य योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान प्राप्त हुए हैं। इनमें राज्य रोल मॉडल पुरस्कार (2021), राष्ट्रीय पुरस्कार (2022), सुषमा स्वराज सम्मान (2023), राष्ट्र गौरव सम्मान (2023), आचार्य भारत मुनि पुरस्कार (2024) तथा इंडियन हीरोज अवार्ड (2024) प्रमुख हैं। इसके अलावा उन्हें “बनारस की लता” की सम्मानित उपाधि से भी नवाजा गया है।
प्रो. मंगला कपूर आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को संगीत शिक्षा से जोड़ने के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं। उनका जीवन संगीत, शिक्षा और समाज सेवा के प्रति समर्पण का एक प्रेरणादायक उदाहरण है।
