
रांची: उलगुलान पदयात्रा के नेतृत्वकर्ताओं शिक्षाविद अजय टोप्पो, निरजना हेरेंज टोप्पो, आशुतोष सिंह चेरो, अधिवक्ता राकेश बड़ाईक और राजेश लिंडा ने राज्य के आदिवासी समुदाय से अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए जागरूक होने का आह्वान किया।
पदयात्रा के नेतृत्वकर्ताओं ने कहा कि राज्य में विस्थापन, जमीन से जुड़े विवाद, बेरोजगारी और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे गंभीर चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातु से शुरू की गई उलगुलान पदयात्रा का मुख्य उद्देश्य बिरसा मुंडा के विचारों और संघर्ष की भावना को लोगों तक पहुंचाना तथा आदिवासी-मूलवासी समुदाय को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना है।
नेतृत्वकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पिछले 25 वर्षों से झारखंडी समाज अपने अधिकारों और सपनों की अनदेखी महसूस कर रहा है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की रक्षा तथा वीर शहीदों के सपनों के सम्मान के लिए पदयात्रा के माध्यम से आवाज उठाई जा रही है।
पदयात्रा में राज्य के विभिन्न जिलों से आदिवासी नेतृत्वकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। आयोजकों के अनुसार, यात्रा के दौरान लोगों का समर्थन मिला और बड़ी संख्या में लोग पदयात्रा से जुड़े।सरकार के सामने रखी 10 सूत्री मांगें
उलगुलान पदयात्रा के माध्यम से सरकार के सामने निम्न प्रमुख मांगें रखी गईं—
खतियान आधारित स्थानीय नीति लागू की जाए।
100 प्रतिशत झारखंडियों के हित में नियोजन नीति बनाई जाए।

झारखंड के आदिवासी-मूलवासी युवाओं के लिए रोजगार में प्राथमिकता सुनिश्चित की जाए।
पेसा नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए।
पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में CNT/SPT कानूनों के उल्लंघन पर जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
आदिवासी जमीन से जुड़े CNT/SPT मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाए।
आदिवासी जमीन की सुरक्षा के लिए CNT, SPT, काश्तकारी और Wilkinson Rules से जुड़े मामलों को देखने के लिए विशेष आयोग का गठन किया जाए।
यदि किसी आदिवासी की जमीन पर अवैध कब्जा या हस्तांतरण हुआ है तो जमीन वापस रैयतदार को दिलाने की व्यवस्था की जाए और भूमि संरक्षण आयोग बनाया जाए।
आदिवासी जमीन से जुड़े सादा पट्टा और एग्रीमेंट के माध्यम से होने वाले हस्तांतरण पर प्रभावी अंकुश लगाया जाए।
सरकारी विभागों में बैकलॉग की खाली सीटों को आरक्षण कोटे के अनुसार भरा जाए।
पदयात्रा के नेतृत्वकर्ताओं ने कहा कि इन मांगों को लेकर आंदोलन के माध्यम से सरकार का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। उन्होंने आदिवासी समुदाय से अपने संवैधानिक अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और रोजगार के मुद्दों को लेकर एकजुट होने की अपील की।
