
रांची: झारखंड की राजधानी रांची में दशहरा के अवसर पर होने वाला रावण दहन आज एक भव्य आयोजन का रूप ले चुका है। इस आयोजन का इतिहास करीब 78 साल पुराना है। वर्ष 1948 में शुरू हुई यह परंपरा आज भी लोगों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। हर साल मोरहाबादी मैदान में बड़ी संख्या में लोग रावण दहन देखने पहुंचते हैं।
इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1948 में रांची कॉलेज के पास महात्मा गांधी मार्ग स्थित डाकघर के सामने परिसर में हुई थी। उस समय 12 फीट ऊंचे रावण के पुतले का निर्माण किया गया था। धीरे-धीरे यह आयोजन लोकप्रिय होता गया और इसमें लोगों की भागीदारी बढ़ने लगी।

वर्ष 1950 से 1955 के बीच रावण के पुतलों का निर्माण रेलवे स्टेशन के पास खजुरिया तालाब स्थित शरणार्थी शिविर में होने लगा। इस दौरान रावण दहन बारी पार्क, यानी वर्तमान टाउन हॉल के पास किया जाता था। बाद में पंजाबी हिंदू बिरादरी के सदस्यों ने डोरंडा स्थित राम मंदिर में पुतलों का निर्माण शुरू कराया।
आयोजन में बढ़ती भीड़ और लोगों के उत्साह को देखते हुए वर्ष 1960 से मोरहाबादी मैदान को रावण दहन के लिए चुना गया। इसके बाद से ही इस आयोजन का स्वरूप लगातार भव्य होता गया और पुतलों की ऊंचाई भी बढ़ती गई।
इस वर्ष मोरहाबादी मैदान में 70 फीट ऊंचे रावण, 65 फीट ऊंचे कुंभकर्ण और 60 फीट ऊंचे मेघनाथ के पुतले तैयार किए जाएंगे। इसके अलावा 30×30 फीट की दो मंजिला सोने की लंका भी बनाई जाएगी, जो आयोजन का प्रमुख आकर्षण होगी।

पंजाबी हिंदू बिरादरी की ओर से हर साल इस आयोजन को और भव्य बनाने के साथ-साथ विभिन्न समुदायों को जोड़ने का प्रयास किया जाता है। रावण दहन का यह कार्यक्रम बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने के साथ रांची की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपरा को भी जीवंत बनाए रखता है।
कुल मिलाकर, वर्ष 1948 में 12 फीट के रावण से शुरू हुआ रांची का यह आयोजन आज भव्यता और जनभागीदारी की पहचान बन चुका है। मोरहाबादी मैदान में होने वाला रावण दहन शहर के प्रमुख दशहरा आयोजनों में शामिल है।