
रांची: आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय अध्यक्ष सुशील उराँव के नेतृत्व में छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने शनिवार को लोकभवन, रांची में राज्यपाल से मुलाकात कर वर्ष 2027 में प्रस्तावित परिसीमन, अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा, पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों के संवैधानिक संरक्षण तथा पृथक सरना धर्म कोड लागू करने की मांग को लेकर ज्ञापन सौंपा।
प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को बताया कि यदि वर्ष 2027 की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया गया तो झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लगभग 6 विधानसभा सीटें और 1 लोकसभा सीट प्रभावित हो सकती है। इससे आदिवासी समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर होने की आशंका है।
केंद्रीय अध्यक्ष सुशील उराँव ने कहा कि झारखंड राज्य का गठन आदिवासी समाज के लंबे संघर्ष, बलिदान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा की भावना से हुआ है। ऐसे में केवल जनसंख्या आधारित बदलाव के आधार पर आदिवासी समाज के राजनीतिक अधिकारों में कटौती स्वीकार नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि बिहार राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत प्राप्त जनजातीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अक्षुण्ण रखा जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि विकास परियोजनाओं, खनन, औद्योगिकीकरण और विस्थापन के कारण हुए जनसांख्यिकीय बदलाव का राजनीतिक नुकसान आदिवासी समाज को नहीं दिया जाना चाहिए। साथ ही आदिवासी भूमि, मूलवासी भूमि और गैर-मजरूआ जमीनों पर हुए अतिक्रमण एवं बाहरी आबादी के प्रभाव को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
आदिवासी छात्र संघ के केंद्रीय कोषाध्यक्ष सह संयोजक डॉ. जलेश्वर भगत ने कहा कि सरना धर्म कोड की मांग कई दशकों से की जा रही है और आगामी जनगणना से पहले इसे लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि वर्ष 2005 में भी रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) से मिलकर जनगणना प्रपत्र में पृथक सरना धर्म कॉलम की मांग की गई थी।
उन्होंने कहा कि आदिवासी छात्र संघ झारखंड समेत ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में जन-जागरूकता अभियान चलाएगा ताकि आदिवासी समाज अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पहचान को जनगणना में दर्ज करा सके।
इस अवसर पर केंद्रीय अध्यक्ष सुशील उराँव, केंद्रीय कोषाध्यक्ष डॉ. जलेश्वर भगत, रांची विश्वविद्यालय अध्यक्ष मनोज उराँव, विद्यासागर, संजय एवं रवि उपस्थित थे।
