
रांची: राजधानी रांची के करमटोली स्थित प्रेस क्लब में मंगलवार को केंद्रीय सरना समिति द्वारा आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न ज्वलंत मुद्दों पर प्रेस वार्ता आयोजित की गई। इस दौरान समाज की पहचान, सरना धर्म, जनगणना और आदिवासी अधिकारों से जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

केंद्रीय सरना समिति के केंद्रीय अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि वर्तमान समय में आदिवासी समाज संक्रमण काल से गुजर रहा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरना और सनातन धर्म एक नहीं हैं तथा सरना और ईसाई समुदाय को भी एक ही पहचान के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की अपनी अलग धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान है, जिसे संरक्षित करने की आवश्यकता है।

उन्होंने देश के गृह मंत्री द्वारा आदिवासियों को वनवासी कहे जाने पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि आदिवासी, वनवासी नहीं बल्कि आदिवासी ही हैं। उन्होंने आगामी जनगणना 2026-27 को महत्वपूर्ण बताते हुए समाज के लोगों से धर्म कॉलम में सरना धर्म अंकित करने की अपील की।

बिरसा वाहिनी फाउंडेशन की संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रिया मुंडा ने कहा कि देश के 10 राज्यों में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र लागू है और झारखंड के 13 जिलों में पेसा कानून प्रभावी है। इसके बावजूद आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन, धर्म, परंपरा और संस्कृति की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है। उन्होंने कहा कि समाज में वैमनस्य फैलाने वाले तत्वों को समाज स्वयं जवाब देगा।

केंद्रीय सरना समिति महिला मोर्चा की अध्यक्ष एंजेल लकड़ा ने कहा कि कुछ लोग समाज में भ्रम और विभाजन पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी धर्म को मानने की स्वतंत्रता है, लेकिन सरना धर्म की अलग पहचान को समाप्त करने या अन्य धर्मों के साथ जोड़ने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए।

प्रेस वार्ता में बिरसा वाहिनी फाउंडेशन के निदेशक विजय मुंडा, सरना आदिवासी विकास एकता मंच महुआडांड़ (लातेहार) के अध्यक्ष मंगलदेव नगेसिया, रांची जिला सरना समिति के अध्यक्ष अमर तिर्की, बोकारो जिला सरना समिति के अध्यक्ष विनय मुर्मू, बेरमो सरना समिति के अध्यक्ष राजेश उरांव समेत कई सामाजिक कार्यकर्ता और समाज के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।



