66 साल बाद जमीन घोटाला उजागर: 94 एकड़ म्यूटेशन नहीं, दलालों ने फर्जीवाड़े से बेच डाली जमीन

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रांची से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने सरकारी सिस्टम और जमीन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। RIMS (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) के नाम पर अधिग्रहित जमीन में भारी अनियमितता का खुलासा हुआ है।


जानकारी के अनुसार, वर्ष 1960 के आसपास RIMS के लिए कुल 262.76 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने वर्षों में सिर्फ 168.78 एकड़ जमीन का ही म्यूटेशन कराया गया। यानी करीब 94 एकड़ जमीन का म्यूटेशन कभी हुआ ही नहीं। इसी लापरवाही का फायदा उठाकर जमीन दलालों ने बड़ा खेल कर दिया।


बताया जा रहा है कि म्यूटेशन नहीं होने के कारण जमीन का सरकारी रिकॉर्ड पूरी तरह स्पष्ट नहीं था। इसी का फायदा उठाकर दलालों ने फर्जी कागजात तैयार किए, नकली वंशावली बनाई और जमीन की खरीद-बिक्री शुरू कर दी। इतना ही नहीं, इस जमीन पर अपार्टमेंट और अन्य निर्माण भी कर दिए गए।


जांच में यह भी सामने आया है कि जमीन से जुड़े रिकॉर्ड में छेड़छाड़ की गई। ऐसे दस्तावेज तैयार किए गए जिन्हें बैंक तक आसानी से पकड़ नहीं सके। इस पूरे मामले में कई कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है।


मामला उजागर होने के बाद RIMS प्रशासन हरकत में आया है। संस्थान की ओर से म्यूटेशन कराने के लिए अंचल अधिकारी (CO) को पत्र भेजा गया है, ताकि बाकी बची जमीन का रिकॉर्ड दुरुस्त किया जा सके।


सूत्रों के अनुसार, करीब चार साल पहले भी इस जमीन की जांच शुरू की गई थी, लेकिन उस समय पूरा सच सामने नहीं आ पाया। अब जब मामला खुला है, तो प्रशासन पर सख्त कार्रवाई का दबाव बढ़ गया है।


सबसे बड़ा सवाल यह है कि 66 साल तक म्यूटेशन क्यों नहीं हुआ? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? और जिन लोगों ने यह जमीन खरीदी है, उनका क्या होगा?


यह मामला सिर्फ जमीन घोटाले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। अब देखना होगा कि सरकार इस पर क्या कार्रवाई करती है।

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